धर्म प्रवर्तक और संतसिख धर्म कथाएं

मानव जाति की एकता का प्रतीक थे गुरु नानक देव

स्वप्निल व्यास, इंदौर @ जयंती पर विशेष. सब महि जोति-ज्योति है, सोई, तिस दै चानणां सम चाणन होई।’ यानी सभी मनुष्य एक ही परमात्मा के अंश हैं और सभी को समान भाव से देखना ही आत्मज्ञान है। लेकिन अपने भीतर समता की भावना विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए। नानक कहते थे कि अहंकार छोड़े बिना समता का भाव पैदा नहीं होगा। वे संसार से पलायन के विरुद्ध थे। समाज से हटकर मनुष्य कभी मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हमें अपने समाज में ही जीना और मरना है। अत: हमें एकता, साझेदारी और आपसी भाईचारे पर जोर देना चाहिए। उनका कहना था कि उन दीवारों को तोड़ दो, जिनकी बुनियाद झूठे भ्रमों पर आधारित है। और ऐसे पुलों का निर्माण करो, जो एक इंसान को दूसरे इंसान से जोड़ते हैं। नानक कहते थे कि सिर्फ जात-पांत ही नहीं, स्त्री-पुरुष में भी भेद करना मानव समानता में बाधक है। वे नारी के प्रति असीम आदर प्रकट करते हुए कहते हैं ‘सो क्या मंदा जानिए, जित जनमे राजान।’ जिसने राजाओं और महापुरुषों को जन्म दिया, उस स्त्री को छोटा क्यों कहते हो?

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लेखक स्वप्निल व्यास, इंदौर

उन्होंने समता की भावना पर सर्वाधिक जोर दिया और कहा कि सभी एक ही ईश्वर के नूर हैं। उनके लिए अच्छे मनुष्य की पहचान भी यही थी। अच्छा आदमी वह है, जिसमें समता की भावना हो: ‘ ऐसे जन विरले जग अंदहि, परख खजाने पाइया। जाति वरन ते भए अतीता, ममता लोभ चुकाया।।’ इसके अलावा गुरु नानक निजी सदाचार पर सर्वाधिक जोर देते थे। ‘ नानक अवगुण जे टरै तेते गल जंजीर। जो गुण होनि ता कटी, अनि से भाई से वीर।। उनका मानना था कि बुराई को छोड़ने पर ही हम अच्छाई ग्रहण कर सकते हैं। समाज में व्याप्त इन्हीं बुराइयों को दूर करने के लिए नानक देव का जन्म इस देश की भूमि पर 23 नवंबर 1469 ई. को हुआ था।

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गुरु नानक देव ने उन अच्छाइयों पर जोर दिया, जिससे समाज को ऊंचा उठाने में मदद मिले। एक तरह से उनकी शिक्षाएं केवल दर्शन नहीं एक आचार शास्त्र हैं। निम्नलिखित आचरण पर उन्होंने सर्वाधिक जोर दिया- आत्मनिर्भरता, बांट के खाना, दया, विवेक-विचार, विद्या और नम्रता। कबीर साहब और गुरु नानक देव की शिक्षाओं में बहुत समानता है। दोनों ने पाखंड, मिथ्याचार एवं जातिवाद का विरोध किया और उस समय की परिस्थितियों के अनुसार हिन्दू-मुस्लिम एकता पर सर्वाधिक जोर दिया। निराश भारतीयों में भक्ति मार्ग द्वारा उत्साह का संचार किया। लेकिन कबीर की वाणी थोड़ी तीखी थी, जबकि नानक देव की वाणी में नम्रता एवं मिठास अधिक थी। कबीर साहब की शिक्षा भारत तक सीमित रही, परंतु नानक ने दूर देशों में भी जाकर एक परमात्मा एवं मानव एकता पर जोर दिया। यहां तक कि मक्का में भी उन्होंने काबा के पुजारियों को यह शिक्षा दी कि ईश्वर सर्वत्र है। भारत के प्राचीन वेदांत दर्शन के अनुसार, नानक ने भी आत्मा को परमात्मा का ही अंश माना। इस तरह से वे मनुष्य की गरिमा को बढ़ाते रहेकी स्थिति है, उसमें नानक देव के उपदेश अधिक प्रासंगिक हैं। यदि सभी धर्मावलंबी उनके उपदेशों को हृदय से स्वीकार करें, तो अनेक जटिल समस्याएं सहज ही दूर हो जाएंगी। गुरु जी की अमृत वाणी आज भी गुरु ग्रंथ साहब के पाठों में उपलब्ध है। आवश्यकता है उन उपदेशों को आचरण में उतारने की। आगे चलकर उनकी शिक्षाओं को लेकर ही सिख संप्रदाय का उदय हुआ, जो कला और देश की रक्षा में अपनी अप्रतिम भूमिका निभाता आ रहा है।

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