छत्तीसगढ़सिख धर्म कथाएं

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जनता को बैसाखी पर्व की बधाई

रायपुर. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बैसाखी पर्व के पावन अवसर पर सिक्ख समाज सहित आम जनता को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने आज यहां जारी बधाई संदेश में कहा है यह खेतों में नई फसल के स्वागत का महापर्व है, जो पंजाब की धरती पर मेहनतकश किसानों के साथ सभी लोगों के जीवन में उत्साह का नया पैगाम लेकर आता है। डॉ. सिंह ने इस अवसर पर सिक्खों के दसवें गुरू गोविंद सिंह महाराज द्वारा 13 अप्रैल 1699 को खालसा पंथ की स्थापना के ऐतिहासिक प्रसंग को भी याद किया। उन्होंने सिंह ने सिक्ख समाज सहित सभी लोगों के जीवन में सुख समृद्धि की कामना की है।

13 अप्रैल 1699 को खालसा पंथ की स्थापना के ऐतिहासिक प्रसंग

गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: २२ दिसम्बर १६६६, मृत्यु: ७ अक्टूबर १७०८) सिखों के दसवें गुरु थे। उनके पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त ११ नवम्बर सन १६७५ को वे गुरू बने। वह एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन १६९९ में बैसाखी के दिन उन्होने खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है।
गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ, गुरू गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है।

उन्होने मुगलों या उनके सहयोगियों (जैसे, शिवालिक पहाडियों के राजा) के साथ १४ युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें ‘सर्वस्वदानी’ भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं।
गुरु गोविंद सिंह जहां विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिंतक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रंथों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में ५२ कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें ‘संत सिपाही’ भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे।

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