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चैती छठ: अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य, होती है इनकी पूजा

भोपाल। हर त्योहार का अपना महत्व है यहां आज बात हो रही है चैती छठ की। मुख्य रुप से बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों के निवासियों के बीच प्रचलित इस त्योहार को साल में दो बार मनाया जाता है। चैत्र और कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की छठवीं को मनाया जाता है। इस बार चैती छठ 30 मार्च को मनाया जा रहा है।

हालांकि लाॅक डाउन के चलते लोगों को नदी तटों पर नहीं देखा गया। लोगों ने अपने-अपने घर पर ही इस त्योहार को मनाया वहीं अनेक बड़े आयोजन भी इस बार नही हो सके।

चार दिनों के उत्सव का प्रारंभ नहाए खाए से होता है दूसरे दिन खरना जबकि छठवीं के दिन डूबते सूर्य और सप्तमी के दिन उगते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। संध्याकाल में अर्घ्य देने के बाद 31 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इस दिन व्रती सूर्य के निकलने से पहले उठते हैं सबसे पहले डाले पर जाते हैं नदी, सरोवर में खड़े होकर दूध व जल से सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है उनसे परिवार व अन्य सभी की समृद्धि के लिए आषीष मांगा जाता है। इसके उपरांत व्रती जल ग्रहण कर व्रत खोलते हैं। जिसके बाद पर्व का समापन हो जाता है।

चढ़ाते हैं ये प्रसाद
इस पर्व पर छठी मैया और भगवान सूर्यदेव की पूजा का अत्यंत महत्व है। उन्हें ईख, गन्ना, फल पकवान, सब्जियां आदि चढ़ाई जाती हैं। वहीं गुड़ और चावल की बनी खीर, गेहूं के आटेे और गुड़ से बने ठेकुआ भी अर्पित किए जाते हैं। एक बार पूजा संपन्न होने के बाद सबसे पहले व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं उसके बाद परिवार के दूसरे सदस्य।

कहते हैं सूर्य उर्जा और सकारात्मकता के देवता हैं वहीं छठी मैया संतान को दीर्घायु एवं परिवार को समृद्धि प्रदान करती हैं। इस पर्व में परिवार के सभी सदस्य बड़े उत्साह से शामिल होते हैं।

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